Chandra Shekhar Azad | Complete Biography | All Things to Know

चंद्रशेखर आजाद 'एक वीर गाथा'

        भारत की धरती पर अनगिनत महापुरुषों, क्रांतिकारियों और महान योद्धाओं ने जन्म लिया, जिन्होंने भारत में जन्म लेकर इस धरती को अनादिकाल तक पवित्र कर दिया है। हम यहां उस वीर महान क्रांतिकारी की बात कर रहे हैं, जिसने बहुत ही कम उम्र में भारत को अंग्रेजी सरकार से आजाद करवाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। हम बात कर रहे हैं, भारत के वीर सपूत शहीद चंद्रशेखर आजाद की। चंद्रशेखर आजाद में बचपन से ही देश भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। हम यहाँ चंद्रशेखर आजाद के महान जीवन, महान व्यक्तित्व और उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक कारनामों के बारे में जानेंगे, जिनके कारण हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। यह वीर क्रांतिकारी मरते दम तक कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आया था। वह कहते थे  -  "आजाद थे, आजाद हैं और आजाद ही रहेंगे"।

चंद्रशेखर आजाद का प्रारंभिक जीवन :   चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव में हुआ था। आजाद के पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम श्रीमती जगरानी देवी था। वैसे आजाद के पूर्वज बदरका गांव, उन्नाव के रहने वाले थे, लेकिन वहां अकाल पड़ने के कारण वे बदरका से भाबरा गांव आकर बस गए। यहीं बालक चंद्रशेखर आजाद का बचपन बीता। बचपन में आजाद को निशानेबाजी का बहुत शौक था। उन्होंने भी बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाए और निशानेबाजी में महारत हासिल कर ली। चंद्रशेखर आजाद को व्यायाम करने का भी बहुत शौक था। इसलिए उनका शरीर प्रारंभ से ही सुडौल और हष्ट पुष्ट था।

                     आजाद को आम खाने का भी बहुत शौक था। जब वे 13 वर्ष के थे तो एक बार उन्होंने अपने पिता जी का नाम लेकर बाग के माली से कुछ आम ले लिये। जब उनके पिता सीताराम तिवारी को इस बात का पता चला, तो उन्होंने बालक चंद्रशेखर आजाद को बाग़ के मालिक से माफी मांगने के लिए कहा, लेकिन आजाद ने कहा कि मैंने ऐसा कोई गुनाह नही किया है, जो मैं बाग के मालिक से माफी मांगू। मैंने तो केवल कुछ आम ही लिए हैं लेकिन उनके पिता भी स्वाभिमानी और अडिग स्वभाव के थे उन्होंने आजाद के सामने शर्त रखी कि जब तक वह माली से माफी नहीं मांगेगा तब तक वह घर में एक कदम नहीं रखेगा आजाद ने कई घंटों तक घर के बाहर रहकर इंतजार किया कि उनके पिता उन्हें वापस बुलाने आएंगे, लेकिन उनके पिता तब तक मानने के लिये तैयार नहीं थे, जब तक वह माली से माफी ना मांग ले बस चंद्रशेखर आजाद तभी छोटी सी 13 वर्ष की उम्र में ही घर को छोड़कर चले गए और उसके बाद वे कभी भी अपने घर वापस लौट कर नहीं आए।

                  उसके बाद चंद्रशेखर आजाद एक ट्रेन में बैठ कर मुंबई पहुंचे, वहां कुछ दिनों तक उन्होंने मेहनत मजदूरी की। उस समय उन्हें मजदूरी के तौर पर मात्र दो पैसे मिलते थे। इसके साथ-साथ चंद्र शेखर आजाद को सिनेमा देखने का भी बहुत शौक था, इसलिए वे कभी-कभी पैसे बचाकर सिनेमा देखने भी जाते थे। मुंबई से कुछ दिन बाद वे बनारस चले गए और वहां काशी विद्यापीठ से संस्कृत और हिंदी में पढ़ाई की। चंद्रशेखर आजाद को पढ़ाई के साथ-साथ कसरत करने का भी बहुत शौक था, जिसके कारण उनका शरीर काफी ताकतवर था। चंद्रशेखर आजाद उसूलों के व्यक्ति थे। उस समय बनारस में एक बदमाश का बहुत खौफ था। वह रास्ते में आने-जाने वाली लड़कियों के साथ छेड़छाड़ किया करता था, लूटपाट करता था, लोगों को डराया-धमकाया करता था एक दिन बनारस की सब्जी मंडी में एक युवती, जो सब्जी खरीद रही होती है, वह गुंडा उस पर अभद्र भाषा का प्रयोग करता है चंद्रशेखर आजाद भी उस समय वहां से गुजर रहे थे। वे उस गुंडे को ऐसा ना करने के लिए समझाते हैं, लेकिन वह नहीं मानता है। इसके बाद आजाद ने उसकी इतनी बुरी तरह से पिटाई कर दी कि उसके बाद वह गुंडा कभी भी उस इलाके में दिखाई नहीं दिया और उसकी बदमाशी भी समाप्त हो जाती है। जिसके कारण उस इलाके के लोगों ने भी चैन की सांस ली। यहीं से चंद्रशेखर आजाद प्रसिद्ध होना शुरू हो जाते हैं। लोग उन्हें जानने पहचानने लग जाते हैं। उस समय उनकी उम्र मात्र 16 या 17 वर्ष की थी।

आजाद द्वारा क्रांतिकारी गतिविधियों की शुरूआत :   महात्मा गांधी ने सन् 1922 में अपना असहयोग आंदोलन चला रखा था, जिसमें देश के लाखों लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और इसके साथ ही चंद्र शेखर आजाद भी इस आंदोलन में  कूद पड़े। उन्होंने इस आंदोलन का जोरदार समर्थन किया, लोगों को विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया। कुछ समय बाद चंद्रशेखर आजाद को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस अफसर सरदार गुंडा सिंह ने बालक चंद्रशेखर आजाद को 15 बेंत मारने की सजा का आदेश दिया। आजाद ने प्रत्येक लाठी की मार पड़ने पर 'वंदे मातरम' और 'भारत माता की जय' के नारे लगाए। जब उनकी यह सजा पूरी हो जाती है तो इसके बाद सरदार गुंडा सिंह उन्हें अपने घर ले जाते हैं और उनकी मरहम पट्टी और हल्दी वाला गर्म दूध पिलाते हैं। वह चंद्रशेखर आजाद को बोलते हैं कि बेटा तुम बहुत आगे तक जाओगे। इसके बाद से चंद्रशेखर आजाद लोगों में और ज्यादा प्रसिद्ध हो जाते हैं। उस समय देश को साहसी और हिम्मत वाले लोगों की बहुत जरूरत थी और चंद्र शेखर आजाद उनमें से एक थे। उस समय चंद्रशेखर आजाद चाहते तो आसानी से कांग्रेस को जॉइन कर सकते थे और एक बड़े नेता बन सकते थे। भारत के आजाद होने पर वह एक अच्छा और सम्मानजनक पद भी पा सकते थे। लेकिन उनका मकसद तो भारत को जल्द से जल्द अंग्रेजी सरकार से  आजाद कराने का था। उस समय अंग्रेजी सरकार कांग्रेस में मौजूद नेताओं के साथ थोड़ा बेहतर व्यवहार करती थे, जेल में उन्हें अधिक यातनाएं नहीं दी जाती थी। लेकिन इसके विपरीत अंग्रेज, क्रांतिकारियों के साथ बहुत ही बुरा व्यवहार करते थे, पकड़े जाने पर उन्हें पूरी तरह से मारा पीटा जाता था, काला पानी भेज दिया जाता था, फांसी पर लटका दिया जाता था। चंद्रशेखर आजाद कई क्रांतिकारी संगठनों में शामिल हुए।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन: चंद्रशेखर आजाद को पता था कि सरकार सिर्फ धमाकों की भाषा ही समझती है। इसलिए देश को आजाद करवाने के लिए अक्टूबर 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक क्रांतिकारी संगठन का निर्माण किया गया। इस क्रांतिकारी संगठन के मुख्य संस्थापक रामप्रसाद बिस्मिल,  अशफाक उल्ला खाँ, योगेश चंद्र चटर्जी और चंद्रशेखर आजाद जैसे बड़े क्रांतिकारी नेता थे। काकोरी ट्रेन कांड के बाद दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में हुई गुप्त बैठक के बाद 9 सितंबर 1928 को इस संगठन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रख दिया गया।

काकोरी ट्रेन कांड :     किसी भी संगठन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है, तभी वह संगठन आगे बढ़ सकता है। इसलिए चंद्रशेखर आजाद सरकारी खजाने से भरी ट्रेन लूटने की योजना बनाते हैं। क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों द्वारा चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दिनांक 9 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन को लूटने के लिए 10 सदस्यीय टीम का गठन किया जाता है। टीम ने योजना बनाई कि बिना किसी यात्री को क्षति पहुंचाए, सारा खजाना लूटा जाएगा, ताकि संगठन को भविष्य में सुचारू रूप से संचालित किया जा सके। योजना के मुताबिक इस टीम द्वारा ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन कांड को अंजाम दिया जाता है और अंग्रेजों का सरकारी खजाना लूटकर उनके सामने एक चुनौती पेश की जाती है। इस घटना के बाद संगठन के कुछ महान क्रांतिकारी नेता अंग्रेजी सरकार द्वारा पकड़ लिये जाते हैं। इनमें से भारत के महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा दे दी जाती है।

 मेजर सांडर्स की हत्या :       1920-1930 तक के समय में क्रांतिकारी गतिविधियाँ पहुंच अधिक तेज थी। अंग्रेज क्रांतिकारियों के पकड़े जाने पर उन्हें कठोर से कठोर सजा देते थे। चंद्र शेखर आजाद की भगत सिंह के साथ मुलाकात हुई। काकोरी ट्रेन कांड के बाद अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आजाद को पकड़ने के लिए 2000 रूपये का इनाम घोषित कर दिया। चंद्रशेखर आजाद झांसी में कुछ दिन साधु के भेष में एक मंदिर में लोगों को रामायण का पाठ पढ़ाया करते थे। वहां वे बच्चों को भी पढ़ाते थे। यह सब चंद्रशेखर आजाद इसलिए किया करते थे ताकि उन्हें अंग्रेज पहचान ना सके। कुछ दिनों के बाद स्थिति सामान्य होने पर आजाद कानपुर वापिस लौट आते हैं। सन 1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कानून 'साइमन कमीशन' भारत को तोड़ने के लिए आता है, जिसमें कोई भी भारतीय इसका सदस्य नहीं था, इसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हजारों लोगों ने साइमन कमीशन का विरोध किया। लेकिन इसमें कर्नल स्कॉट के आदेश पर किये गए लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के साथ मिलकर कर्नल स्कॉट को मारने की योजना बनाते हैं। 17 दिसंबर 1929 को गुप्त सूचना के आधार पर चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के द्वारा कर्नल स्कॉट की जगह मेजर सांडर्स को मार दिया जाता है। मेजर सांडर्स को मारने के बाद चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह वहां से भाग जाते हैं।

असेंबली हॉल में बम ब्लास्ट :    चंद्रशेखर आजाद में ऐसी नेतृत्व क्षमता थी कि बार-बार संगठन के टूटने पर भी उसे दोबारा पुनर्गठन कर लेते थे और फिर से क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के लिए युवाओं को प्रेरित करते थे। लार्ड इरविन जो उस समय अंग्रेजी सरकार में वायसराय के पद पर थे। 8 अप्रैल 1929 को वह भारत में दो बिल लेकर आए, जिसमें ट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल थे। इन दोनो बिलो के तहत अगर कोई भी भारतीय किसी भी प्रकार की आवाज उठाता है या क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेता है तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाए और विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने इन दोनों बिलों का पुरजोर विरोध किया। चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ने बिलों के विरोध में असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया क्योंकि ये दोनों बिल पूर्ण रूप से भारतीय लोगों के विरुद्ध थे, इनमें लोगों की आवाज को दबाया जा रहा था। असेंबली में बम फेंकने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने खुद इच्छा प्रकट की कि मैं असेंबली में बम ब्लास्ट करूंगा। लेकिन दल का कोई भी सदस्य इस बात से सहमत नहीं था, क्योंकि चंद्र शेखर अाजाद दल के मुख्य नेता थे, वह दल का नेतृत्व बेहतर तरीके से कर रहे थे। इसलिए कोई भी चंद्र शेखर आजाद की जान जोखिम में नहीं डालना चाहते थे। इसके अलावा चंद्र शेखर आजाद के देश भर के क्रांतिकारी संगठनों के साथ संबंध बहुत अच्छे थे। वह उन क्रांतिकारी संगठनों के अंग्रेजों द्वारा तोड़ दिए जाने पर दुबारा उठ खड़े होने के लिए भरपूर मदद करते थे।

                      बाद मे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त  को असेंबली में बम फेंकने के लिए चुना गया। आजाद भगत सिंह से बहुत प्रभावित थे, वे यह जानते थे कि अगर असेंबली में बम फैंका जाता है, तो वहां से बच पाना मुश्किल है। लेकिन चंद शेखर आजाद ने उसका भी इंतजाम कर दिया था। उन्होंने योजना बनाई कि जब भगत सिहं इस काम को अंजाम देंगें तो उस दौरान दो बाइक चालू हालत में रहेगी, अगर कोई पकड़ने के लिए सामने आता है तो उस पर गोली चला दी जाएगी और हम दोनो को लेकर वहां से भाग जाएंगे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों असेंबली हॉल में पहुंचते हैं, वहां असेंबली चल रही होती है। वे ऐसे स्थान पर बम फैंकते हैं, जहां पर कोई हताहत ना हो। बम फैंकते ही 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाए जाते हैं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त शांतिपूर्वक अपनी गिरफ्तारी दे देते हैं। भगत सिंह चाहते थे कि भारत के लोग उन्हे एक आतंकवादी की नजर से ना देखें, बल्कि एक क्रांतिकारी की नजर से देखें, जो देश को आजाद कराना चाहते हैं। इसलिए वे खुद को गिरफ्तार हो जाने में ही समझदारी समझते हैं। लेकिन चंद शेखर आजाद उनकी गिरफ्तारी से बहुत अधिक दुखी होते हैं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार करने के बाद फांसी की सजा सुना दी जाती है।

चंद्रशेखर आजाद का संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एक मजबूत संगठन था। इस संगठन के मुख्य सदस्यों में यशपाल, वीरभद्र तिवारी, कैलाशपति और भगवती चरण वोहरा की भूमिका महत्वपूर्ण थी। ये चारों मुख्य रुप से दल की सभी क्रांतिकारी गतिविधियों को देखते थे, इन्हीं के पास सभी क्रांतिकारियों के पते रहते थे, ग्रुप को आर्थिक मदद का बंदोबस्त यही लोग करते थे। असेंबली बम केस के बाद ब्रिटिश पुलिस क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का काम शुरू कर देती है। चंद्रशेखर आजाद अपने दल के सभी सदस्यों को इस से सतर्क रहने की चेतावनी देते हैं। उस समय भारत के लोगों में एकता की बहुत कमी थी, अंग्रेजी सरकार और पुलिस में अधिकतर लोग भारतीय होते थे जो सरकार के इशारे पर आम भारतीय लोगों पर जुल्म करने का काम करते थे। अगर उस समय भारतीय लोग एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर देते, तो भारत कब का आजाद हो जाता। चंद्रशेखर का यह प्लान था कि पूरे भारत के क्रांतिकारी संगठनों से बातचीत करके एक साथ देश के मुख्य सभी शहरों पर धावा बोलकर सभी शहरों को अपने कब्जे में ले लिया जाएगा और इस तरह भारत को अंग्रेजों से आजादी मिल जाएगी।

संगठन का बिखरना : चंद्रशेखर आजाद और उनके साथी एक घर में बम बनाने का काम शुरू किया, जिसकी सारी जिम्मेवारी सुखदेव और जय गोपाल के पास थी। बम बनाने में पिकरिक एसिड का इस्तेमाल किया जाता था, जिस के प्रयोग से बम बनाते समय एक पीले रंग का द्रव्य पदार्थ नाली के जरिए घर से बाहर बह रहा था। पड़ोस के लोगों को इस बात का पता चल जाता है और वे  इसकी सूचना पुलिस को दे देते हैं। पुलिस सुखदेव और जय गोपाल को गिरफ्तार कर लेती है और उन्हें गिरफ्तार करने के बाद अनेक यातनाएं दी जाती हैं। असहनीय यातनाओं के कारण सुखदेव सभी क्रांतिकारियों के पता बता देता है और यह संगठन टूटना शुरू हो जाता है। लेकिन फिर भी चंद्रशेखर आजाद हिम्मत नहीं हारते हैं और संगठन को फिर से एकजुट करने में लग जाते हैं, जो कि इतना आसान काम नहीं था।

वायसराय लॉर्ड इर्विन को मारने का प्लान :     चंद्रशेखर आजाद, क्रांतिकारी यशपाल को वायसराय लार्ड इरविन को मारने का काम सौंपते हैं। एक बार लॉर्ड इरविन ट्रेन से सफर कर रहे थे, प्लान यह था की पटरी पर बम लगाया जाएगा और जब लार्ड इरविन का डिब्बा वहां से गुजरेगा, तो बटन दबाते ही बम ब्लास्ट करके लॉर्ड इरविन वाले डिब्बे को उड़ा दिया जाएगा। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है और इरविन के डब्बे की जगह दूसरे डिब्बे में ब्लास्ट होने पर उसमें आग लग जाती है और इस तरह लार्ड इरविन को मारने का प्लान असफल हो गया। इसके बाद चंद्र शेखर आजाद यशपाल पर बहुत गुस्सा होते हैं और उसकी कनपटी पर रिवाल्वर रख देते हैं, लेकिन यशपाल अपनी इस गलती के लिए आजाद से माफी मांगते हैं और चंद्रशेखर आजाद उसे गले लगा लेते हैं।

गांधी जी के साथ मतभेद :       उस समय क्रांतिकारियों और कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा था। वे एक दूसरे के विरोधी थे, महात्मा गांधी अपने अखबार 'यंग इंडिया' में क्रांतिकारियों के बारे में काफी भला-बुरा छपवाते हैं और उसकी प्रतिलिपि घर-घर भिजवा देते हैं। जिससे देश के लोगों में क्रांतिकारियों की इमेज खराब हो जाती है। इसी वजह से चंद शेखर आजाद काफी दुखी हो जाते हैं। वे कहते हैं कि हम क्रांतिकारी देश को आजाद करवाने के लिए अपनी कुर्बानियाँ दे रहे हैं और गांधी जी जैसे महान नेता हमारे बारे में ऐसा बोल रहे हैं। गांधी जी एक ऐसे नेता थे जिनकी भारतीयों के अलावा अंग्रेजी सरकार भी बात मानती थी। चंद्रशेखर आजाद का मानना था कि अगर गांधी जी मजबूती के साथ अंग्रेजी सरकार के सामने भगत सिंह का पक्ष रखते तो वे भगत सिंह को बचा सकते थे। 1931 में हुये गांधी-इरविन समझौते के दौरान गांधीजी ने लॉर्ड इर्विन को कहा था कि भगत सिंह को फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया जाए। लेकिन लार्ड इरविन ने इसे नामंजूर कर दिया था। बाद में भगत सिंह ने पत्र के माध्यम से यह साफ किया कि मुझे फांसी मंजूर है, आजीवन कारावास नहीं।

भगत सिंह को बचाने की योजना :   इसके बाद चंद्र शेखर आजाद स्वयं भगत सिंह को बचाने का प्लान बनाते हैं, क्योंकि भगत सिंह उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। चंद्रशेखर आजाद और उनके कुछ साथी एक किराए के मकान में फिर से बम बनाने का काम शुरू करते हैं, आजाद के मुताबिक यह प्लान था कि जिस जेल में भगतसिंह कैद हैं वहां बम फैंके जाएंगे और भगत सिंह को जबरदस्ती जेल से लेकर फरार हो जाएंगे। अगर कोई भी इसका विरोध करता है, तो उसे गोली मार दी जाएगी। बम फेंकने का काम भगवती चरण वोहरा को दिया जाता है। जैसे ही वह बम फेंकने वाले होते हैं, बम उनके हाथों में ही फट जाता है जिससे उनकी मौत हो जाती है। मौत से पहले भगवती चरण वोहरा बोलते हैं कि 'पंडित जी को बोल देना कि वह उनका यह काम नहीं कर सके'। आजाद का भगवती चरण वोहरा पर बहुत अधिक भरोसा था। लेकिन चंद्रशेखर हिम्मत नहीं हारते हैं और कहते हैं कि हम भगत सिंह को आजाद करवाने की दोबारा कोशिश करेंगे, लेकिन उनकी यह कोशिश भी नाकाम हो जाती है वे जिस किराए के मकान में रहते थे, उसकी अलमारी में रखा बम भी अचानक से अपने आप ही फट जाता है। धमाके की आवाज सुनकर लोग इकट्ठा हो जाते हैं और मकान मालिक भी वहां पहुंच जाता है। सब तरफ अफरा-तफरी मच जाती है। चंद्र शेखर आजाद मकान मालिक की कनपटी पर रिवाल्वर रख देते हैं और कहते हैं कि अगर तुम्हे अपनी जान प्यारी है, तो यहां से भाग जाओ। भगवान को भी यह मंजूर ही नहीं था कि भगत सिंह को बचाया जा सके, उनका नाम तो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में अमर शहीदों की लिस्ट में लिखा जाना था।

 संगठन में मतभेद :     चंद्रशेखर आजाद कभी नहीं चाहते थे कि कोई महिला उनके ग्रुप में शामिल हो। लेकिन वे महिलाओं की बहुत इज्जत करते थे। यशपाल को एक लड़की प्रकाशवती से प्रेम हो जाता है और जहां संंगठन पैसों की कमी से जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर यशपाल बेकार के कार्यों में संगठन के पैसे खर्च कर रहे होते हैं। चंद्रशेखर आजाद यशपाल पर भी काफी भरोसा करते थे, लेकिन जब उन्हें इस बात का पता चलता है तो वह उससे घृणा करने लग जाते हैं। अब यशपाल ने भी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना बंद कर दिया और चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ हो गया। आजाद ने सोचा कि यशपाल को अब मार दिया जाना चाहिए। इसलिए उन्होंने यह काम वीरभद्र तिवारी को दिया, लेकिन वीरभद्र ने उसे मारने की बजाए, यशपाल को प्रकाशवती के साथ दूसरे शहर में भगा दिया। इसके बाद वीरभद्र तिवारी और कैलाशपति  दोनों चंद्रशेखर आजाद के विरुद्ध हो जाते हैं। आजाद को इस बात से बहुत बड़ा आघात पहुंचता है कि जिस संगठन का निर्माण उन्होंने देश को आजाद करवाने के लिए किया था वह संगठन अब टूट रहा था।

चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु :     इसके बाद दिल्ली में क्रांतिकारियों की एक बैठक बुलाई गई और भविष्य में आजादी के आंदोलन की गतिविधियों के बारे में चर्चा की गयी। उसके बाद चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद पहुंचें। उन्होंने भगत सिंह की सजा को किसी भी तरह कम या फिर उम्र कैद में बदलने की पुरजोर कोशिश की। 27 फरवरी 1931 को चंद्र शेखर आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में टहल रहे थे, किसी के द्वारा दी गई गुप्त सूचना के आधार पर उनकी खबर पुलिस को लग गयी और पुलिस द्वारा अल्फ्रेड पार्क को चारों ओर से घेर लिया गया। चंद्रशेखर आजाद ने भी वहां ब्रिटिश पुलिस का डटकर मुकाबला किया। इस मुठभेड़ में कई पुलिस वाले मारे गये। लेकिन आखिर में आजाद के पास मात्र एक गोली बची थी। वे किसी भी तरह खुद को पुलिस के हाथों नहीं मरना देना चाहते थे। वे भारत माता से क्षमा मांगते हैं कि मैं भारत को आजाद नहीं करवा पाया। इस तरह चंद्रशेखर आजाद खुद को गोली मारकर वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। जब लोगों को चंद्रशेखर आजाद की मौत के बारे में पता चला तो भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आये और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। बाद मे चंद्रशेखर आजाद से प्रेरित होकर हजारों युवा स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। चंद्रशेखर आजाद के बलिदान से देश को तुरंत तो आजादी नहीं मिली लेकिन वे भारत के लोगों में आजादी की चिंगारी जरूर लगा गए थे। इसके साथ ही आजादी के आंदोलन ने तीव्र गति पकड़ ली। चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के 16 साल बाद, 15 अगस्त 1947 को आजाद भारत का उनका सपना पूरा हुआ।

चंद्रशेखर आजाद एक विरासत के रूप में :    इस तरह भारत के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद सदा के लिए अमर हो गए और उनकी अमर गाथा इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में छप गई।

चंद्रशेखर आजाद ब्रिटिश सरकार के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गये थे, क्योंकि आजाद को पकड़ पाना ब्रिटिश सरकार के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण था।

 चंद्रशेखर आजाद जिस पार्क में शहीद हुए थे, उस पार्क का नाम बदलकर 'चंद्रशेखर आजाद पार्क' रखा गया, जिस पेड़ के नीचे उन्होंने आखिरी सांस ली थी, लोग आज भी उस पेड़ की पूजा करते हैं और जिस पिस्तौल से चंद्र शेखर आजाद ने खुद को गोली मारी थी उसे इलाहाबाद के म्यूजियम में संजोकर रखा गया है।

भारत में बहुत से स्कूल, कॉलेज, रास्तों और सार्वजनिक संस्थाओं के नाम उन्हीं के नाम पर रखे गए हैं। हम ऐसे वीर क्रांतिकारी  "अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद" को शत-शत नमन करते हैं।

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Meenakshi Sharma

Passionate to writing the Biography of Great Legends

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