The History of Kumbh Mela

             कुंभ एक महोत्सव

            मैं आज भारत के ऐसे महापर्व की बात करने जा रहा हूं, जो कि अपने आप में भारत की सनातन संस्कृति का प्रतीक है। वह भारत की प्राचीन मान्यताओं को संरक्षित एवं जीवंत करने वाला एक अनोखा स्वतः स्फूर्त जन आयोजन है। मैं बात कर रहा हूं भारत के महा पर्व कुंभ मेले की। कुंभ मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। पूरे विश्व मे जो लोग भारत दर्शन करना चाहते हैं, उन्हें कुंभ मेले में भारत की विविधता एक जगह पर सिमटी हुई मिल जाएगी। कुंभ अपनी विशालता के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इसके अलावा यह अपनी विविधता के लिए भी आश्चर्यचकित करता है। कुंभ में विभिन्न भाषाओं, विभिन्न वेशभूषाओं, विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न संप्रदायों के लोग भारत दर्शन के लिए आते हैं। यह पृथ्वी पर होने वाला सबसे बड़ा आयोजन है। कुंभ मेला एक आनंद का उत्सव है। यह समस्त दुखों, चिंताओं से मुक्त होकर जीवन की मधुरता को पाने का एक अवसर है। कण-कण में दिव्यता का अनुभव करवाने वाला यह मेला मानव जीवन का महोत्सव है। कुंभ मेला मूलतः संतों और सन्यासियों ओं का मेला है। देशभर की साधु-संतों की टोलियां, अपने-अपने संप्रदायों एवं अखाड़ों की ध्वजाओं के नीचे कुंभ में अपना डेरा जमाते हैं।  कुंभ मेला भारत का राष्ट्रीय समागम है। कुंभ को सनातन परंपरा के प्राण कहा जाता है। कुंभ के समय इन संत महात्माओं की साधना और सत्संग से अनवरत अमृत झलकता है। कुंभ के माध्यम से भारत को समझा और जाना जा सकता है।

 कुंभ मेले का इतिहास :-  कुंभ मेला अत्यंत प्राचीन है, जिसका कोई प्रारंभ नहीं है। कुंभ मेले का आयोजन भारत के पवित्र स्थानों मे हजारों वर्षों से किया जा रहा है। वैसे कुंभ के बारे में सबसे प्राचीन लिखित दस्तावेज छठी शताब्दी में मिलता है। प्राचीन चीनी यात्री ह्वेनसांग अपनी यात्रा वर्णन में लिखते हैं कि "प्रत्येक 6 वर्षों में प्रयाग में गंगा नदी के तट पर बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते थे। इस समय राजा हर्षवर्धन यहां अपना सर्वस्व दान कर दिया करते थे और सिर्फ पहने हुए वस्त्रों के साथ अपने महल को वापस चले जाते थे।" यहां पर वे प्रयाग में आयोजित होने वाले कुंभ मेले की ही बात कर रहे थे। कुंभ मेले के इतिहास को पौराणिक कथाओं से भी जोड़ा जाता है।

            पौराणिक कथाओं के अनुसार कुंभ पर्व का इतिहास इस कथा से भी संबंधित है : कश्यप ऋषि का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्रियों दिति और अदिति के साथ हुआ था। अदिति से देवों की उत्पत्ति हुई और दिति से दैत्य पैदा हुए। एक बार देव और दैत्यों ने फैसला किया कि समुद्र में छिपी हुई बहुत सी विभुतियों और संपत्ति को प्राप्त कर उसका उपभोग किया जाए। इसके लिए समुद्र मंथन एकमात्र उपाय था। समुद्र मंथन के दौरान कुल 14 रत्न प्राप्त हुए, उनमें से 13 रत्नों को तो देव-दैत्यों ने आपस में बांट लिया। लेकिन 14वाँ अमृत कलश था। इस अमृत कलश को प्राप्त करने के लिए देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध छिड़ गया, क्योंकि दोनों उसे पीकर अमरत्व की प्राप्ति करना चाह रहे थे। युद्ध के दौरान इंद्र पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर भाग गया। इस पर दैत्यों ने उसका पीछा किया और पीछा करने पर देवताओं और दैत्यों के बीच 12 दिन तक भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान अमृत कुंभ को सुरक्षित रखने में बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा ने बड़ी सहायता की। बृहस्पति ने दैत्यों के हाथों में जाने से कलश को बचाया। सूर्य ने कुंभ को फूटने से रक्षा की और चंद्रमा ने अमृत छलकने से बचा। फिर भी भीषण संग्राम के दौरान मची उथल-पुथल में अमृत कुंभ से कुछ बंदे छलक ही गई। अमृत की ये बूंदे चार स्थानों पर गिरी। इनमें से एक गंगा तट हरिद्वार में, दूसरी त्रिवेणी संगम प्रयागराज में, तीसरी शिप्रा नदी उज्जैन में और चौथी गोदावरी तट नासिक में। इस प्रकार इन चार स्थानों पर अमृत प्राप्ति की कामना से कुंभ पर्व मनाया जाने लगा और इसलिए इन स्थानों पर कुंभ मेला लगता है। देवताओं का 1 दिन धरती के 12 साल के बराबर होता है। इसलिए हिंदू धर्म में कुंभ मेला 12 वर्ष के बाद इन पवित्र स्थानों पर लगता है।

         कुंभ को भारतीय संस्कृति का महापर्व कहा गया है। इस पर्व पर स्नान, दान, ज्ञान मंथन के साथ ही अमृत प्राप्ति की बात भी कही गई जाती है। कुंभ का बौद्धिक, पौराणिक और ज्योतिष के साथ-साथ वैज्ञानिक आधार भी है। वेद भारतीय संस्कृति के आदि ग्रंथ है। कुंभ का वर्णन वेदो में भी मिलता है। कुंभ का महत्व ना केवल भारत में, बल्कि विश्व के अनेक देशों में है। इस पर्व के दौरान दुनिया के अनेक देशों से लोग आते हैं और हमारी संस्कृति में रचने बसने की कोशिश करते हैं। इसलिए कुंभ का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। कुंभ पर्व प्रत्येक 12 वर्ष बाद उसी स्थान पर मनाया जाता है।

       सनातन धर्म में नदियों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बड़े तीर्थ या उत्सव प्राय: नदियों के तट पर ही होते हैं। तीर्थ शब्द का अर्थ ही है वह स्थान जो पार लगा दे। कुंभ मेला करोड़ों लोगों को अपने सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का एक दिव्य अवसर प्रदान करता है। कुंभ मेला कब और कहां आयोजित होगा इस बात का निर्धारण खगोलीय घटनाओं के आधार पर ही होता है। ऐसा माना जाता है कि इन काल अवधियों में आध्यात्मिक ऊर्जा इन स्थानों पर केंद्रित होती है, इसलिए इस आयोजन को दैवीय आयोजन भी कहा जाता है। सूर्य चंद्रमा और बृहस्पति के विभिन्न राज्यों में प्रवेश होने के संयोग से कुंभ मेले के स्थान और तिथियों का निर्धारण होता है। सनातन धर्म  मैं सूर्य को आत्मा चंद्रमा को मन और बृहस्पति को धर्म का देवता माना गया है। तो आइए जानते हैं कि कुंभ मेला कब कब और किन किन स्थानों पर आयोजित किया जाता है।

 अर्धकुंभ :- अर्ध का अर्थ है आधा। अर्धकुंभ केवल हरिद्वार और प्रयाग स्थलों पर ही दो कुंभ पर्वों के बीच 6 वर्ष के अंतराल पर आयोजित किया जाता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्धकुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। वर्ष 2019 में तीर्थराज प्रयाग में 15 जनवरी से 4 मार्च 2019 तक एक भव्य अर्धकुंभ का आयोजन किया जाएगा। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्धकुंभ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।

कुंभ का पर्व भारत के निम्नलिखित चार तीर्थ स्थलों पर आयोजित किया जाता है।

  •  हरिद्वार का कुंभ :       हरिद्वार का संबंध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य के प्रवेश होने पर, हरिद्वार में कुंभ पर्व का आयोजित किया जाता है। हरिद्वार में अर्ध कुंभ का भी आयोजन किया जाता है। अर्ध कुंभ, दो कुंभ पर्वों के बीच 6 वर्ष के अंतराल पर आयोजित किया जाता है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार में बहती गंगा के किनारे स्थित 'हर की पौड़ी' स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह जल अमृत मय हो जाता है। यही कारण है कि अपनी अंतर आत्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्थान करने लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। हरिद्वार में पिछला पूर्ण कुंभ 2010 में और अर्ध कुंभ 2016 में आयोजित किया गया था। हरिद्वार की इस पावन धरती पर अगला पूर्ण कुंभ 2022 में आयोजित किया जाएगा।
  • प्रयाग में कुंभ  :-      प्रयाग में कुंभ का विशेष महत्व है। प्रयागराज की पवित्र धरती भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की पहचान रही है। प्रयाग ही एकमात्र स्थल है, जहां देश की तीनों पावन नदियां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम होता है। ज्योतिष के अनुसार माघी अमावस्या को सूर्य मकर राशि में, चंद्रमा और बृहस्पति मेष राशि में हो, तभी प्रयाग राज में कुंभ का योग बनता है। प्रयागराज में अनेक तीर्थ है, जैसे त्रिवेणी संगम, अक्षय वट और सरस्वती कूप आदि। प्रयाग में कुंभ के दौरान अनेक पर्व मनाये जाते हैं। जैसे मकर सक्रांति, पौष पूर्णिमा, माघी (मौनी) अमावस्या, बसंत पंचमी एवं महाशिवरात्रि आदि। परंतु माघी (मौनी) अमावस्या प्रयाग कुंभ का  सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व होता है। इससे पहले 2013 में पूर्ण कुंभ का आयोजन प्रयाग में हुआ था। और अब 15 जनवरी 2019 से अर्ध कुंभ का आयोजन एक भव्य स्तर पर किया जा रहा है।
  • उज्जैन का कुंभ :-      जब सूर्य मेष राशि में और बृहस्पति सिंह राशि में हो तो उस समय उज्जैन में कुंभ का योग बनता है। यहां यह स्थिति वैशाख माह की पूर्णिमा को होती है। उज्जैन का अर्थ है विजय की नगरी। यह नगर मध्य प्रदेश की पश्चिम सीमा पर शिप्रा नदी के तट पर बसा हुआ है। उज्जैन भारत के पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है। उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग विराजमान है। पिछला कुंभ यहां 2016 में आयोजित किया गया था। इसके बाद उज्जैन में अगला कुंभ 2026 में आयोजित किया जाएगा।
  • नासिक में कुंभ :-    जब सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति तीनों सिंह राशि में हो, तब गोदावरी तट 'नासिक' में कुंभ का योग बनता है। यह स्थिति भाद्रपद की अमावस्या को बनती है। नासिक महाराष्ट्र राज्य के गोदावरी तट पर बसा है। 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ (कुंभ मेला) नासिक त्रयंबकेश्वर के शहर में आयोजित किया जाता है। नासिक कुंभ मेले में सैकड़ों श्रद्धालु गोदावरी के पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं। पिछला नासिक कुंभ मेला 2015 में आयोजित किया गया था और अगला नासिक कुंभ मेला 2022 में आयोजित किया जाएगा।

          कुंभ मेला किसी भी श्रद्धालु के लिए एक खुला आमंत्रण है। हिंदू धर्म की इसी सामाजिक संरक्षता के दर्शन करने का और  सहबंधुत्व की भावना को जीने का यह एक शुभ अवसर है।कुंभ मेले का अपना एक अर्थशास्त्र भी है। प्राचीन काल से ही भारत में अर्थव्यवस्था के सफल संचालन में उत्सवों, मेलों एवं तीर्थाटन का विशेष महत्व रहा है। देश के चारों कोणों में लगने वाले कुंभ मेले देश की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में एवं नए रोजगार के अवसर सृजन करने में मददगार साबित होते हैं। कुंभ एक विराट मंच है, जहां भारत की विभिन्न कलाएं अपने रंग बिखेरती हैं,  देश के विभिन्न राज्यों के कलाकार अपनी पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। कुंभ में आने वाले तीर्थयात्री इन अद्भुत कलाओं से परिचित होते हैं व इनका आनंद उठाते हैं। कुंभ के अवसर पर एक अस्थाई नगर बसता है। कुंभ को सफलतापूर्वक संपन्न करवाने व आयोजित करवाने में सरकार, प्रशासन एवं धार्मिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। कुंभ अपने आप में उच्च स्तरीय प्रबंधन, कुशल प्रशासन, आपसी समन्वय और गहरी समझ का अद्भुत उदाहरण है। कुंभ मेले में अध्ययन के लिए विदेशों से भी वैज्ञानिक आते हैं, ताकि उन्हें भारत की सभ्यता व संस्कृति का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हो सके। हमें उम्मीद है कि इस वर्ष 2019 में प्रयाग में आयोजित किया जाने वाला कुंभ मेला शांति पूर्ण रूप से संपन्न होगा और करोड़ों श्रद्धालुओं की मनोकामना को पूर्ण करेगा।

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Narender Sharma

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